योग का अर्थ -
जीवात्मा का परमात्मा से मिल जाना पूरी तरह से एक हो जाना ही योग है। योगाचार्य महर्षि पतंजलि ने सम्पूर्ण योग के रहस्य को अपने योग दर्शन में सूत्रों के रूप में प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार, "चित को एक जगह स्थापित करना योग है।
वैसे तो अस्टांग योग में योग के सभी आयामों का समावेश हो जाता है किन्तु जो सभी योग के अन्य मार्ग से स्वस्थ, साधना या मोक्ष लाभ लेना चाहता है तो ले सकता है।
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योग के मुख्यता 6 प्रकार :-
1 - राजयोग
2 - हठयोग
3 - लययोग
4 - ज्ञानयोग
5 - कर्मयोग
6 - भक्तियोग
1 - राजयोग :-
यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि यह पातंजली के आठ अंग है। इन्हे अष्टांग योग बी कहा जाता है।
2 - हठयोग :-
षष्ठकर्म, आसन, मुद्रा, प्रत्याहार, ध्यान और समाधि ये हठयोग के 6 अंग है लेकिन हठयोग का जोर आसन एवं कुंडली जागृत के लिए आसन, बंध, मुद्रा और प्राणायाम पर अधिक रहता है।
3 - लययोग : -
यम, नियम, स्थूल क्रिया, सूछम क्रिया, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि ये लययोग के 8 अंग है।
4 - ज्ञानयोग : -
साक्षीभाव द्वारा विशुद्व आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना ही ज्ञान योग है। यही ध्यान योग है।
5 - कर्मयोग : -
कर्म करना ही कर्म योग है। इसका उद्देश्य है कर्मो में कुशलता लाना।
6 - भक्तियोग : -
भक्त श्रवन, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, बंदन, दास्य को भक्तियोग है।

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